Kya Sikh religion me cow(beef, jhatka) khana allow h
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Kya Sikh religion me cow(beef, jhatka) khana allow h
Respected Gaurav ji,
Waheguru ji ka Khalsa, Waheguru ji ki Fateh!
In response to your question about eating meat, the undersigned wants to say that at Panna 16 of Guru Granth Sahib, the First Guru Person, Guru Nanak Sahib teaches as under:
बाबा होरु खाणा खुसी खुआरु ॥ जितु खाधै तनु पीड़ीऐ मन महि चvलहि विकार ॥१॥ रहाउ ॥
उच्चारण: बाबा होर खाणा खुसी खुआर॥ जित खाधै तन पीड़ीअै मन मह चलहि विकार॥१॥ रहाउ॥
अर्थ: हे भाई! जिन पदार्थों के खाने से शरीर रोगी हो जाता है, और मन में (भी कई) बुरे ख्याल चल पड़ते हैं, उन पदार्थों को खाने से खुआर होते है।1। रहाउ।
Therefore, one should not eat those foods, which don’t suit the body and/or results in bad thoughts in the mind.
Further, the Baani of the First Guru Person, Guru Nanak Sahib, at Pannas 1289-1290 of Guru Granth Sahib, given below with meanings, clearly indicates that eating meat has nothing to do with the religion. Guru Sahib is also teaching that one should not be addicted to eating any particular food.
Therefore, as per teachings of Guru Granth Sahib, eating meat is a matter of choice and suitability and is not a subject for discussion.
Hope it helps. If you have any further questions, please do ask. If you find any deficiencies, please point out the same, for improvement in future.
Regards,
Your Brother
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सलोक मः १ ॥ पहिलां मासहु निमिआ मासै अंदरि वासु ॥ जीउ पाइ मासु मुहि मिलिआ हडु चमु तनु मासु ॥ मासहु बाहरि कढिआ ममा मासु गिरासु ॥ मुहु मासै का जीभ मासै की मासै अंदरि सासु ॥ वडा होआ वीआहिआ घरि लै आइआ मासु ॥ मासहु ही मासु ऊपजै मासहु सभो साकु ॥ सतिगुरि मिलिऐ हुकमु बुझीऐ तां को आवै रासि ॥ आपि छुटे नह छूटीऐ नानक बचनि बिणासु ॥१॥ {पन्ना 1289}
अर्थ: सबसे पहले माँस (भाव, पिता के वीर्य) से ही (जीव के अस्तित्व का) आरम्भ होता है, (फिर) माँस (भाव, माँ के पेट) में ही इसका बसेवा होता है; जब (पुतले में) जान पड़ती है तब भी (जीभ-रूपी) माँस मुँह में मिलता है (इसके शरीर की सारी ही घाड़त) हड्डी चमड़ी और शरीर सब कुछ मास (ही बनता है)।
जब (माँ के पेट-रूप) माँस में से बाहर भेजा जाता है तो भी स्तन (-रूप) माँस खुराक मिलती है; इसका मुँह भी माँस का है जीभ भी मास की है, माँस में ही साँस लेता है। जब जवान होता है और ब्याहा जाता है तो भी (स्त्री-रूप) माँस ही घर ले के आता है; (फिर) माँस से ही (बच्चा-रूप) माँस पैदा होता है; (सो, जगत का सारा) साक-संबंध माँस से ही है।
(माँस खाने व ना खाने पर निर्णय समझने की जगह) यदि सतिगुरू मिल जाए तो प्रभू की रज़ा समझें तब जीव (का जगत में आना) सफल होता है (नहीं तो जीव का पैदा होने से लेकर मरने तक माँस से इतना गहरा वास्ता पड़ता है कि) अपने जोर से इससे बचने से कोई मुक्ति नहीं होती, और हे नानक! (इस किस्म की) चर्चा से (सिर्फ) हानि ही होती है।1।
मः १ ॥ मासु मासु करि मूरखु झगड़े गिआनु धिआनु नही जाणै ॥ कउणु मासु कउणु सागु कहावै किसु महि पाप समाणे ॥ गैंडा मारि होम जग कीए देवतिआ की बाणे ॥ मासु छोडि बैसि नकु पकड़हि राती माणस खाणे ॥ फड़ु करि लोकां नो दिखलावहि गिआनु धिआनु नही सूझै ॥ नानक अंधे सिउ किआ कहीऐ कहै न कहिआ बूझै ॥ अंधा सोइ जि अंधु कमावै तिसु रिदै सि लोचन नाही ॥ मात पिता की रकतु निपंने मछी मासु न खांही ॥ इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥ मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ बाहर का मासु मंदा सुआमी घर का मासु चंगेरा ॥ जीअ जंत सभि मासहु होए जीइ लइआ वासेरा ॥ अभखु भखहि भखु तजि छोडहि अंधु गुरू जिन केरा ॥ मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ मासु पुराणी मासु कतेबीं चहु जुगि मासु कमाणा ॥ जजि काजि वीआहि सुहावै ओथै मासु समाणा ॥ इसत्री पुरख निपजहि मासहु पातिसाह सुलतानां ॥ जे ओइ दिसहि नरकि जांदे तां उन्ह का दानु न लैणा ॥ देंदा नरकि सुरगि लैदे देखहु एहु धिङाणा ॥ आपि न बूझै लोक बुझाए पांडे खरा सिआणा ॥ पांडे तू जाणै ही नाही किथहु मासु उपंना ॥ तोइअहु अंनु कमादु कपाहां तोइअहु त्रिभवणु गंना ॥ तोआ आखै हउ बहु बिधि हछा तोऐ बहुतु बिकारा ॥ एते रस छोडि होवै संनिआसी नानकु कहै विचारा ॥२॥ {पन्ना 1289-1290}
अर्थ: (अपनी तरफ़ से माँ का त्यागी) मूर्ख (पण्डित) मास-मास कह के चर्चा करता है, पर, ना इसको आत्मिक जीवन की समझ ना ही इसको सुरति है (वरना, ये ध्यान से बिचारे कि) माँस और साग में क्या फर्क है, और किस (के खाने) में पाप है। (पुराने समय में भी, लोग) देवताओं के स्वभाव के अनुसार (भाव, देवताओं को खुश करने के लिए) गैंडा मार के हवन और यज्ञ करते थे। जो मनुष्य (अपनी ओर से) माँस त्याग के (जब कभी कहीं माँस देखते हैं तो) बैठ के अपना नाक बँद कर लेते हैं (कि माँस की बदबू आ गई है) वे रात को मनुष्य को खा जाते हैं (भाव, छुप के मनुष्यों का लहू पीने के मनसूबे घड़ते हैं); (माँस ना खाने का यह) पाखण्ड करके लोगों को दिखाते हैं, वैसे इनको खुद ना समझ है ना ही सुरति है। पर, हे नानक! किसी अंधे मनुष्य को समझाने का कोई लाभ नहीं, (यदि कोई इसको) समझाए भी, तो भी ये समझाए समझते नहीं हैं।
(अगर कहो अंधा कौन है तो) अंधा वह है जो अंधों वाले काम करता है, जिसके दिल में वह आँखें नहीं हैं (भाव, जो समझ से विहीन है), (नहीं तो सोचने वाली बात है कि खुद भी तो) माता और पिता के रक्त से हुए हैं और मछली (आदि) के माँस से परहेज़ करते हैं (भाव, माँस से ही पैदा हो के मांस से परहेज़ करने का क्या भाव? पहले भी तो माता-पिता के मास से ही शरीर पला है)। (फिर,) जब रात को औरत और मर्द इकट्ठे होते हैं तब भी (माँस के साथ ही) मंद (भाव, भोग) करते हैं। हम सारे माँस के पुतले हैं, हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ, हम माँस से ही पैदा हुए, (माँस का त्यागी) पण्डित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है, (दरअसल,) इसको ना समझ है ना ही सुरति है। (भला बताओ,) पंडित जी! (ये क्या कि) बाहर से लाया हुआ माँस बुरा और घर का (बरता हुआ) माँस अच्छा? (फिर) सारे जीव-जंतु माँस से पैदा हुए हैं, जिंद ने (अर्थात प्राणों ने माँस में ही) डेरा लगाया हुआ है; सो, जिनको रास्ता बताने वाला खुद अंधा है वह ना-खाने-योग्य चीज (भाव, पराया हॅक) तो खाते हैं और खाने-योग्य चीज (भाव, जिस चीज से जिंदगी का आरम्भ हुआ) को त्यागते हैं। हम सभी माँस के पुतले हैं, हमारा आरम्भ माँस से ही हुआ है, हम माँस से ही पैदा हुए, (माँस का त्यागी) पंडित (माँस की चर्चा छेड़ के ऐसे ही अपने आप को) समझदार कहलवाता है, (असलियत में) इसको ना समझ है ना सुरति है।
पुराणों में माँस (का वर्णन) है, मुसलमानी मज़हबी किताबों में भी माँस (के प्रयोग का जिक्र) है; जगत के आरम्भ से माँस का उपयोग होता चला आया है। यज्ञ में, (शादी) ब्याह आदि कारजों में (माँस का प्रयोग) प्रधान है, उन जगहों पर माँस बरता जाता रहा है। औरत, मर्द, शाह, पातिशाह… सारे माँस से ही पैदा हुए हें। अगर ये सारे (माँस से बनने के कारण) नर्क में पड़ते दिखते हैं तो उनसे (माँस-त्यागी पंडित को) दान भी नहीं लेना चाहिए। (नहीं तो) देखिए, ये आश्चर्य भरे धक्केशाही की बात है कि दान देने वाले नर्क में जाएं और लेने वाले स्वर्ग में। (दरअसल) हे पंडित! तू खासा चतुर है, तुझे खुद को (माँस खाने के मामले की) समझ नहीं है, पर तू लोगों को समझाता है।
हे पंडित! तुझे ये पता ही नहीं कि माँस कहाँ से पैदा हुआ। (देख,) पानी से अन्न पैदा होता है, कमाद गन्ना उगता है और कपास उगती है, पानी से ही सारा संसार पैदा होता है। पानी कहता है कि मैं कई तरीकों से भलाई करता हूँ (भाव, जीव को पालने के लिए कई किसमों की खुराक़-पोशाक पैदा करता हूँ), ये सारी तब्दीलियां (भाव, बेअंत किस्मों के पदार्थ) पानी में ही हैं। सो, नानक यह विचार की बात बताता है (कि अगर सच्चा त्यागी बनना है तो) इन सारे पदार्थों के चस्के छोड़ के त्यागी बने (क्योंकि माँस की उत्पक्ति भी पानी से ही है और अन्न-कमाद आदि की उत्पक्ति भी पानी से ही है)।2।
Plants and animals are both life forms. Whether we eat plants or animals, we are eating life. Life eats life is a law of nature.