गुरु की दात क्या है, गुरु भक्ति कैसे करें, गुरुमुख कैसे बने?
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Guru/Akalpurakh Giver/Bestower (गुरु दाता)
As per teachings of Guru Granth Sahib, Akalpurakh and Shabad Guru are spiritually embodiment of each other. Please read the Shalok of the First Guru Person, Guru Nanak Sahib and its meanings:-
सलोकु मः १ ॥गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥ अमर पदारथु नानका मनि मानिऐ सुखु होइ ॥१॥
अर्थ: सतिगुरू (नाम की दाति) देने वाला है। गुरू ठण्ड का श्रोत है। गुरू (ही) त्रिलोकी में प्रकाश करने वाला है। हे नानक! कभी ना समाप्त होने वाला (नाम रूपी) पदार्थ (गुरू से मिलता है)। जिसका मन गुरू में पतीज जाए, वह सुखी हो जाता है।1।
Doing Worship (भक्ति Bhakti)
Only with His blessings and by living life, as per His teachings, after cleansing one’s mind of vices and becoming righteous/virtuous, one can do worship. Other outward means don’t help. Please read the following teachings of Guru Granth Sahib:-
तीरथु तपु दइआ दतु दानु ॥ जे को पावै तिल का मानु ॥
अर्थ: तीर्थ यात्राएं, तपों की साधना, (जीवों पे) दया करनी, दिया हुआ दान- (इन कर्मों के बदले) अगर किसी मनुष्य को कोई आदर-सत्कार मिल भी जाए, तो वह नाम मात्र ही है।
सुणिआ मंनिआ मनि कीता भाउ ॥ अंतरगति तीरथि मलि नाउ ॥
अर्थ: (पर जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख के नाम में) सुरति जोड़ी है, (जिस का मन नाम में) पतीज गया है, (और जिस ने अपने मन) में (अकाल-पुरख का) प्यार पैदा किया है, उस मनुष्य ने (मानों) अपने भीतर के तीर्थ में मलमल के स्नान कर लिया है (भाव, उस मनुष्य ने अपने अंदर बस रहे अकाल-पुरख में जुड़ के अच्छी तरह अपने मन की मैल उतार ली है)।
सभि गुण तेरे मै नाही कोइ ॥ विणु गुण कीते भगति न होइ ॥
अर्थ: (हे अकाल-पुरख!) अगर तू (स्वयं खुद) गुण (मेरे में) पैदा ना करें तो मुझसे तेरी भक्ति नहीं हो सकती।
Gurmukh and Manmukh (गुरमुखि = वह मनुष्य जिसका मुँह गुरू की ओर है। मनमुखि = वह मनुष्य जिसका मुँह अपने मन की ओर है)
According to Prof. Sahib Singh ji, who has given meanings of all the Shabads included in Guru Granth Sahib, the entire Guru Granth Sahib is the vyakhya (explanation) of the following two Pangtis of the first Pauri of Jap Baani:-
किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥१॥
Therefore, the basic principles of Sikhi are to become a righteous/ virtuous person and to remain in the Hukam (Divine Law) of Akalpurakh.
If a person’s mind is following the above principles, the person is following Guru Sahib’s teachings and is a Gurmukh. Otherwise, the person’s mind is being driven by the teachings of the world and is a Manmukh.
or details sy samjo ji
The basic principles of Sikhism are enunciated in the first Pauri of Jap Baani of Guru Nanak Sahib, which is at Pannas 1 to 8 of Guru Granth Sahib. Please read the same alongwith their meanings and try to apply in your life:-
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥
उच्चारण: सोचै सोच न होवई जे सोची लख वार॥ चुपै चुप न होवई जे लाय रहां लिव तार॥
अर्थ: अगर में लाखों बार (भी) (स्नान आदि से शरीर की) स्वच्छता रखूँ, (तो भी इस तरह) स्वच्छता रखने से (मन की) स्वच्छता नहीं रहि सकती। यदि मैं (शरीर की) एक-तार समाधि लगाई रखूँ; (तो भी इस तरह) चुप कर के रहने से मन शांत नहीं हो सकता।
भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥
सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥
उच्चारण: भुखिआं भुख ना उतरी, जे बंनां पुरीआं भार॥
सहस सियाणपां लख होहि त इक न चलै नालि॥
अर्थ: यदि मैं सारे भवनों के पदार्तों के ढेर (भी) संभाल लूँ, तो भी त्रिष्णा के अधीन रहने से त्रिष्णा दूर नहीं हो सकती। यदि, (मेरे में) हजारों व लाखों ही चतुराईयां हों, (तो भी उनमें से) एक भी चतुराई साथ नहीं देती।
किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥
हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥१॥
उच्चारण: किव सचियारा होईऐ, किव कूड़ै तुटै पाल॥
हुकम रजाई चलणा, नानक लिखिआ नाल॥१॥
अर्थ: (तो फिर) अकाल पुरख के प्रकाश होने योग्य कैसे बन सकते हैं (और हमारे अंदर का) झूठ का पर्दा कैसे कैसे टूट सकता है? रजा के मालिक अकाल पुरख के हुकम में चलना- (यही एक मात्र विधि है)। हे नानक! (ये विधि) आरम्भ से ही जब से जगत बना है, लिखी चली आ रही है।1।
भाव: प्रभू से जीव की दूरी मिटाने का एक ही तरीका है कि जीव उसकी रजा में चले। ये उसूल धुर से ही ईश्वर द्वारा जीव के लिए जरूरी हैं। पिता के कहने पर पुत्र चलता रहे तो प्यार, ना चले तो दूरी पड़ती जाती है।